Thursday, 25 June 2020

विरासत

"अरे तेरे बाल कितने रूखे हों रहे हैं। ला मैं तेल लगा कर चम्पी कर देती हूँ।" मौसी ने नैना को पास बुलाते हुये कहा। उस वक़्त नैना की उम्र यही कोई उन्नीस- बीस वर्ष रही होगी। उस समय किसको बालों में तेल लगाना अच्छा लगता है। रूखे रूखे, शैम्पू किये हुये बाल ही फ़ैशनेबल लगते हैं। मौसी हर वक़्त अपने बालों में तेल लगाये रहती थीं। उनके हिसाब से बालों में तेल डालना रोजमर्रा के सौंदर्य प्रसाधन का एक हिस्सा होता था। 

मौसी कौन सा रोज़ रोज़ आती थीं। उनकी बात का मान रखते हुए नैना तेल की शीशी ले आयी और चम्पी करवाने लगी। 

" अच्छा मौसी, जब आप लोगों के समय में शैम्पू नहीं आता था, तब आप लोग बाल कैसे धोते थे।" नैना ने पूछा। 

मौसी के बाल बहुत सुंदर थे। आज भी ज़्यादातर काले ही थे और ख़ूब घने और लम्बे। नैना के अंदर कहीं न कहीं बालों को सुंदर रखने की चिंता आन बसी थी। 

" अरे हम लोग तो क्या नहीं लगाते थे, कभी बेसन, कभी मुल्तानी मिट्टी, कभी ये तो कभी वो। और रीठा , शिकाकाई से बाल धोते थे।" मौसी ने कहा। 

"अच्छा....माँ ने तो कभी बताया ही नहीं। " 

"तेरी माँ स्कूल में कबड्डी चैम्पियन थी । खेलने कूदने में ही लगी रहती थी। उसके पास कहाँ वक़्त था बनाव सिंगार का। और ये नुस्ख़े आजमाने का। मैंने अपनी माँ से सारे नुस्ख़े लिए और आजीवन उन्हें अपने जीवन में उतारा। सौंदर्य के, स्वास्थ्य के, स्वाद के अनगिनत नुस्ख़े थे उनके पास। " 

" मौसी मुझे बताओ, कैसे धोते थे रीठा और शिकाकाई से? मैं भी किया करूँगी। फिर मेरे बाल भी आपकी तरह सुंदर हो जायेंगे। है न। " 

"बिल्कुल हो जायेंगे, मेरी रानी बिटिया।" मौसी ने तेल डाल कर नैना की सुंदर सी चोटी गूंथ दी थी। 

"और भी जितने ब्यूटी बढ़ाने वाले नुस्ख़े हैं, सब मुझे बताना। प्लीज़।" नैना ने कहा। 

"अरे बिल्कुल। कौन सा मुझे अपनी छाती में बंद करके ले जाना है। " 

तब से काफी लंबे समय तक नैना ने मौसी के रीठा- शिकाकाई वाले नुस्ख़े को आजमाया। जितनी केअर हो सकती थी करती थी। तेल नियम से डालती थी। काफ़ी सुधार भी आया था उसके बालों की क्वालिटी में। उसके बाल ख़ूब घने लम्बे हो गए थे।

धीरे धीरे काफी समय बीत चला। नैना स्वयँ मौसी बन गयी थी। उसके सामने आज उसकी बहन की बेटी खड़ी थी ,वही उन्नीस- बीस बरस की उम्र लिये। उसके रूखे सूखे बालों को देखकर नैना को अपना समय याद आ गया। कैसे मौसी ने उसे प्यार से अपना आजमाया हुआ एक अचूक नुस्ख़ा दिया था। 

आज उसकी बारी थी, ये विरासत उसे अगली पीढ़ी को सौंपनी थीं। वो तुरन्त जाकर तेल की शीशी ले आयी। और अपनी बहन की बेटी को आवाज़ दी। " तेरे बाल कितने रूखे हो रहे हैं। ला तेल लगा दूँ इनमें।" 


"नो, मौसी, डोंट एवर थिंक ऑफ दैट। मुझे नहीं लगवाना ये चिपचिपा तेल अपने बालों में। " बेटी मुँह बनाते हुये बोली। 

" अरे आ तो ,देख कितनी अच्छी चम्पी करती हूँ मैं। और तुझे एक जादुई घरेलू नुस्ख़ा भी बताती हूँ। देखना तेरे बाल कितने सुंदर हों जाएंगे।" नैना ने अपनी वाणी में मिठास भरते हुये कहा। 

" नहीं मौसी मुझे नही करवाना। मैंने आज ही शैम्पू करके कंडीशनर लगाया है। मेरे हेयर ऐसे ही स्मूथ एंड सिल्की हैं। फिर मैं पंद्रह दिन में एक बार पार्लर जाकर हेयर मसाज, हेयर पैक भी लेती हूँ। हेयर स्पा भी लेती हूँ महीने में एक बार।  ऑय डोंट नीड दीज़ ओल्ड थिंग्स। स्पेयर मी, फ़ॉर गॉड्स शेक।" 

"अरे बेटी, सुन तो। सच में बड़े कारगर होते है ये पुराने नुस्ख़े।" 

"रहने दो मौसी। अभी हाल ही में मेरी दोस्त की बहन की शादी थी। उनकी बुआ ने जबर्दस्ती उसके फेशियल कराए हुये चेहरे पर हल्दी लगवा दी। सारा चेहरा ख़राब करवा दिया था। आप अपने पास ही रखो ये सो कॉल्ड अनोखे पुराने नुस्ख़े।" बेटी ने अपना मोबाइल उठाया, कान में हेडफोन लगाया और दूसरे कमरे में चली गयी। 


नैना अपना सा मुँह लेकर रह गयी। दो पीढ़ी में ही कितना अंतर आ गया था। उसने मौसी की बात टाली नहीं थीं। इसने अपनी मौसी की बात रखी ही नहीं। नैना उदास होकर सारे पुराने नुस्ख़े याद कर कर के अपनी एक डायरी में लिखने लगी। कहीं तो ये विरासत छोड़कर जानी ही है। भूले भटके ही सही,क्या पता,आगे आने वाली पीढ़ी कभी तो इन्हें आजमा ही लेगी। 

उधर से पुल न बने तो भी क्या इधर से पुल बनाने का प्रयास तो करते ही रहना चाहिए। 

टि्वंकल तोमर सिंह,
लखनऊ। 

Monday, 22 June 2020

जीवनसाथी हम..दिया और बाती हम

उनकी जोड़ी मिसाल थी। वो पति पत्नी नहीं साक्षात शिव पार्वती थे। एक दूसरे के लिये समर्पित। हर कोई जब भी उन्हें देखता जी भर कर आशीर्वाद देता था। 

पत्नी पति की इच्छाओं को पूरा करने के उसके पीछे पीछे लगी रहती थी। पति अपनी पत्नी को ख़ुश रखने के लिये नयी नयी तरकीबें आज़माता रहता था। 

रोज शाम होते ही पत्नी अपने पति के पसंद का खाना बनाने में जुट जाती थी। पति लौट कर आता तो आते ही सबसे पहले अपनी पत्नी के माथे को चूमता, उसके बाद ही चाय की प्याली अपने होंठों से लगाता था। 

और तो और वो अधिकतर कपड़े भी मैचिंग के पहनते थे। मतलब अगर पति ने सफेद शर्ट पहनी है, तो पत्नी की कोशिश होती थी कि सफेद रंग पर लाल छींट वाली साड़ी पहनी जाये। पति देखता था कि पत्नी ने आसमानी रंग का कुर्ता पहना है तो फौरन जाकर अपनी वार्डरोब से एक गहरे नीले रंग की शर्ट या टी शर्ट निकाल कर पहन लेता था। 


कुल मिलाकर एक आदर्श जोड़ी थी वो। 

एक बार हमारे मोहल्ले में आयोजित एक कार्यक्रम में उन दोनों ने एक डुएट गाया था। "जीवनसाथी हम...दिया और बाती हम।" दोनों ने एक जैसे हल्के नीले रंग के कपड़े पहने थे। 

और मैं उन्हें हर्षित नज़रों से देखती रह गयी। देखा और यही तमन्ना की कि मेरा जोड़ीदार जब भी मिले, हमारी जोड़ी भी ऐसी ही लगे। 

उसके बाद हमारा ट्रांसफर हो गया। और हम लोग वहाँ से दूसरे शहर शिफ़्ट हो गए। 

इस बीच मेरी शादी हो गयी। मेरे पति कुछ सीरियस स्वभाव के, दार्शनिक, अपनी धुन में रमने वाले व्यक्ति थे। कलाकार हृदय, प्रकृति प्रेमी थे। कम बोलते थे, पर जब बोलते थे तो गंभीर बात ही बोलते थे। पहनने के लिये उन्हें बस सफेद कुर्ता चाहिये होता था। मेरा ख़्याल तो बहुत ही ज़्यादा रखते थे। पर मुझे वो क्लिक नहीं मिलता था, जो मैंने अपने ख्यालों में बसा रखा था। मेरे मन के पर्दे पर तो आदर्श जोड़ी वो थी, जो कपड़े भी एक रंग के पहने।

मतलब आप अपने मन में आदर्श का जो मुकाम सेट कर लेते हैं, फिर अगर उस तक नहीं पहुँच पाते तो कहीं न कहीं दुःख को पनाह देते रहते हैं। मुझे जीवन में पति से सब कुछ मिला, पर जैसे बोगनवेलिया फूलों से भरी रहती है, पर ख़ुशबू नहीं देती। बस वैसे ही मेरे भी मन में एक कसक सी रह गयी। सब कुछ है पर हम आदर्श दम्पति नहीं हैं.....! 

कई सालों बाद मेरा वापस अपने पुराने शहर , अपने पुराने मुहल्ले जाना हुआ, करीब दस साल बाद। 

सबसे मुलाकात करके मैं फौरन अपने उन्हीं आदर्श जोड़ी वाले भैया भाभी के घर की ओर दौड़ गयी। दरवाजे की घंटी बजाई। 

एक आठ दस साल की लड़की ने दरवाजा खोला। मैंने अंदाज़ा लगाया, शायद उनकी बेटी होगी। अंदर से ज़ोर ज़ोर से लड़ने की आवाज़ें आ रहीं थीं। बर्तन फेंकने की, चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आ रहीं थीं। बिटिया ने पूछा मैं कौन हूँ, कहाँ से आयीं हूँ। फिर अंदर चली गयी। 

थोड़ी देर बाद भाभी जी ड्रॉइंग रूम में आयीं। समय की लकीरें उनके चेहरे पर दिखने लगीं थीं। पर उससे भी ज़्यादा उनके चेहरे से ये स्पष्ट था कि वो दस साल पहले वाली खिली खिली रहने वाली भाभी नहीं हैं। 

मुझे देखते ही पहले तो सकुचा गयीं फिर इतने दिनों बाद मुझे देखने की खुशी उनके चेहरे पर खिल गयी। उन्होंने मुझे गले से लगाया , हाल चाल पूछने लगीं। इतनी देर में भैया भी आ गए। मैं उनको देखकर भौंचक रह गयी। बाल अधिकतर गिर चुके थे। पेट निकल आया था। कपड़े अस्त व्यस्त, ढीले ढाले। और हमेशा मैचिंग के कपड़े पहनने वाले जोड़े में पत्नी ने लाल रंग पहना था तो पति ने हरा। 

दोनों पास पास बैठे थे, हँस रहे थे, मुस्कुरा रहे थे, मुझसे उत्साह से बात भी कर रहे थे। पर बीच बीच में किसी भी बात पर एक दूसरे को ताना देना, छेड़ना, तर्क-कुतर्क करना जारी था। शायद अगर मैं वहाँ नहीं बैठी होती तो उनके बीच जो युद्ध विराम लग गया था, वो हट जाता और फिर से महाभारत शुरू हो जाती। 

न जाने क्यों मेरे मन में आदर्श जोड़ी की छवि में दरारें उभर रहीं थीं। 

थोड़ी देर इधर उधर की बातें होने के बाद मैंने कहा," भैया भाभी आप लोग तो बिल्कुल बदल गए। कहाँ जीवनसाथी हम दिया और बाती हम और अब कहाँ ये हाल। " मेरा गला रुँध आया था। 

भैया ने कहा," अरे टिया, तेल ख़त्म हो गया बस। अब कहाँ का दिया और कहाँ की बाती।" 

अंत में मैं अपना सा मुँह लेकर चली आयी। मुझे अपने पति की बेतहाशा याद आने लगी। टेढ़े हैं, मेढ़े हैं, रूखे हैं, सूखे हैं जैसे भी हैं मेरे हैं। बोगनवेलिया जैसे ही हैं , घर को हरा भरा रखेंगे, ख़ूब फूल देंगे, पर ख़ुशबू मत माँगना उनसे। वो गुलाब नहीं हैं कि एक दिन में ही मुरझा जाएं। मेरी आँखें खुल चुकीं थीं। जिस रिश्ते में संतुष्टि के लिये मैं भटक रही थी, वो तो शायद कस्तूरी की तरह मेरे ही अंदर थी। 


कहानी ख़त्म हुई। पर ठहरिए...एक बात तो बताना ही भूल गयी....जब उस आदर्श जोड़ी की छवि मैंने मन में बसायी थी, तब उनके विवाह को मात्र दो वर्ष हुये थे, और मेरी उम्र थी मात्र पन्द्रह वर्ष। 

टि्वंकल तोमर सिंह,
लखनऊ। 





Sunday, 21 June 2020

महायोग


श्वास प्रश्वास की राह से होकर
एक अदृश्य,अदृष्ट संसार पा लेना
सांसों के एकतारे को साध कर
ईश्वर को अपनी लय पर थाम लेना

आत्मा का महात्मा से योग
मन का महामन से मेल, बस
यही कुल सकल आय जीवन की
महायोग अन्ततः हर जन्म का !!

टि्वंकल तोमर सिंह,लखनऊ। 




                                        

Friday, 15 May 2020

किला फुसफुसाता है

किला मुझे सदा से सम्मोहित करता था। एक इतिहास को अपने अंदर दफ़्न किये मोटी मोटी दीवारें जैसे कानों में कुछ फुसफुसा कर कहना चाहती हों। पर क्या मुझे ही ऐसा प्रतीत होता था ? मैंने अपने मित्रों से कई बार पूछा। क्या किले तुम लोगों से भी बात करते हैं ? सबने बड़ी आसानी से मुझे मानसिक रोगी की उपाधि से नवाज़ रखा था। 

मुझे पर्यटन का बहुत शौक था। अक्सर मैं सादे, आरामदायक कपड़ों में एक छोटा सा पिठ्ठू बैग लादे, गले में कैमरा लटकाये चल देती थी। ऐसे ही किसी रोज़ मुझे मरुस्थल से घिरे प्रेमगढ़ के रहस्मयी किले के बारे में इंटरनेट से पता चला। कई लोगों ने उसके बारे में अजीब अजीब सी कहानियाँ डाल रखी थीं। कुछ लोगों को वहाँ जाकर बहुत ही चमत्कारी अनुभव हुये थे। वहाँ पहुंचकर कोई हँसता तो हँसता चला जाता था, रोता था तो रोता चला जाता था। सुनने में ये भी आया था कि वहाँ रात में चीखने चिल्लाने की आवाज़ आती थी। पर वहाँ किसी भी पर्यटक को किसी प्रकार के नुकसान से जान से जाने की कोई ख़बर नहीं थी। 


 फिर मैंने उस किले की फ़ोटो को देखा.......


न जाने क्या आकर्षण था....मैं बस उसे अपलक पाँच मिनट तक देखती ही रह गयी। एक ट्रांस (समाधि) जैसी अवस्था अनुभव हुई। मेरे आस पास का संसार शून्य हो चुका था। और मैं....उस किले के सबसे ऊँचे स्थान पर पहुँच चुकी थी। 


 ......सुरभि....सुरभि.....माँ की आवाज़ मुझे इस ट्रान्स से खींचकर वापस लायी। 

" हाँ माँ... आती हूँ।" मैंने उनको उत्तर दिया। क्या था ये ? क्या मैंने कोई सपना देखा था ? मैंने तो प्रेमगढ़ के किले को देखना तो दूर , राजस्थान की भूमि पर भी कभी पैर नहीं रखा था। ये कैसे हो सकता है? पर मुझे एकदम स्पष्ट अनुभव हुआ  था...वो गर्मी...वो उड़ती हुई बालू...वो हल्की उष्ण हवा मुझे सिहरन दे रही थी...और मैं...प्रेमगढ़ के किले पर सबसे ऊँचे स्थान पर खड़ी हुई। 


मैंने तुरंत अपने लैपटॉप पर प्रेमगढ़ के किले की लोकेशन ढूँढी। वहाँ तक पहुंचने के मार्ग को खंगाला, टिकिट बुक किये और चल पड़ी। सच कहूँ तो मेरे दिमाग ने सही गलत तक कुछ नहीं सोचा, बस जाना है, तो जाना है। जैसे मेरे ऊपर किसी ने जादू कर दिया था। 

प्रेमगढ़ पहुँचते पहुँचते संध्या हो चली थी। प्रेमगढ़ एक बहुत ही छोटा सा कस्बा था। शायद किसी समय यहाँ किले और उसके आस पास लोग बसते रहे हों, यहाँ चहल पहल रहती हो पर अभी तो मुझे काफ़ी सन्नाटा और सुनसान लगा। 

रात एक छोटे से होटल में काटनी थी। होटल के स्टॉफ से पता चला कि प्रेमगढ़ के किले को देखने सैलानी बहुत दूर दूर से आते हैं। पर वहाँ सूर्यास्त के बाद किसी को रुकने नहीं दिया जाता। यहाँ तक कि किले का स्टॉफ या मेन गेट का चौकीदार भी वहाँ नहीं रुकता।

"क्यों?" मैंने जिज्ञासा से पूछा।

"आप यहाँ क्यों आयीं है? क्या सुनकर आयीं हैं इसके बारे में?" रिसेप्शनिस्ट ने उल्टे मुझसे ही प्रश्न दाग़ दिया। 

"अ..अ..वो नेट पर पढ़ा था...रात में अजीब सी चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आतीं हैं।" मैंने अटक अटक कर कहा। मन में ये विचार था कि कहीं अभी मुझे ये रिसेप्शनिस्ट पढ़ी लिखी मूर्ख न समझ ले। 

"बस वही समझ लीजिये।" रिसेप्शनिस्ट ने संक्षेप में उत्तर दिया और अपना काम करने लगा। 

मुझे उसका व्यवहार बहुत रूखा लगा। पर व्यवहारिक रूप से सोचा तो लगा कि शायद जानबूझकर ये लोग ऐसा रहस्य बनाते होंगे जिससे सैलानी और आते रहे। फिलहाल मैं अपना सामान लेकर अपने कमरे में आ गयी। बगल वाले कमरे में शायद कोई जोड़ा रुका हुआ था। उस कमरे से लड़ने की जोर जोर आवाज़ आ रही थी। मैंने सोचा मुझे क्या करना। पर जब मेरी नींद में खलल पड़ने लगा तो मैने ध्यान देकर सुनना शुरू किया।

स्त्री चिल्ला रही थी कि उसे यहाँ नहीं रुकना, अभी ही यहाँ से चल दो। और पुरुष उसे समझा रहा था कि अभी रात में कैसे जाएंगे? सुबह होने पर चलेंगे। 

मुझे लगा एक बार जाकर उनके दरवाज़े पर नॉक करूँ और कहूँ कि जो भी करना है करो, पर दूसरे को तो सोने दो। पर हिम्मत नहीं हुई। मैं पड़ी रही अपने मोबाइल में नोटिफिकेशन देखती रही। तभी बगल वाले कमरे से कुछ खींच कर ले जाने की आवाज़ आयी। ऐसा लगा जैसे कोई औरत रोती हुई अपना समान लेकर भागी जा रही है...और आदमी उसके पीछे पीछे आवाज़ देता हुआ उसे रोकने की कोशिश कर रहा है। भागते हुये कदमों की आवाज़ ने मुझे बैचैन कर दिया था। न चाहते हुए भी मैं उनके झगड़े में सम्मिलित हो चुकी थी। कोफ्त हो रही थी। मेरी पूरी सहानुभूति आदमी के साथ थी। अरे ठीक ही तो कह रहा है कहाँ जाएगी रात के ग्यारह बजे इस समय। 

तभी अचानक एक जोर से कुछ गिरने की आवाज़ आयी...और सब शांत...! 

जिज्ञासा पेट में मरोड़ उत्पन्न करने लगी थी। मैंने दौड़ते हुए दरवाज़ा खोला......देखा तो पूरा कॉरिडोर खाली था। कुछ भी नहीं था। मैं निकल कर बाहर तक पहुँची, रिसेप्शनिस्ट ने अपनी कुर्सी पर ऊँघना शुरू कर दिया था। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। इतनी भड़भड़ में कोई सो कैसे सकता है? 

"हेल्लो..." मैंने चिल्लाकर उसे जगाया। वो हड़बड़ा कर उठा और अपनी आँखें मलने लगा। 

"क्या हुआ, मैडम?" उसने पूछा। 

" इधर जो आदमी-औरत लड़ते हुये गये है...अ... अ... (फिर मैंने बात घुमाते हुये कहा) वो जो कुछ गिरने की आवाज़ आयी थी...क्या था वो?" 

"क्या..??? क्या मैडम...आप भी शुरू ही गयीं ?" उसने बड़ी ही लापरवाही से कहा।।

मुझे गुस्सा आ गया" क्या मतलब ? मैं पागल हूँ? मैं इतनी देर से सो नहीं पा रहीं हूँ। बगल वाले कमरे से लड़ने की इतनी आवाज़ें आ रही थी...." 

" कौन सा बगल वाला कमरा मैडम? 302 ??"

"और कितने कमरे है नीचे?" मैंने चिढ़ कर उत्तर दिया क्योंकि  301 और 302 दो ही कमरे थे ग्राउंड फ्लोर पर। 301 नंबर कमरा मेरा था। 

"मैडम , वो कमरा खाली है। वहाँ कोई नहीं है।" उसने कहा।

"क्या..? मतलब अभी खाली हुआ है न। वो जो जोड़ा चला गया है उसके बाद न ?"

" नही मैडम वो कमरा सुबह से ही खाली है। आपको भ्रम हुआ होगा।" रिसेप्शनिस्ट ने कहा और टीवी चला कर ऐसे देखने लगा जैसे कि ये कोई विशेष बात ही न हो। 

मैं अपनी और बेइज्जती नही कराना चाहती थी।  चुपचाप मैं अपने कमरे में आ गयी। मुझे जरा भी भरोसा नही था कि बगल वाले कमरे में कोई नहीं था। 

थोड़ी देर बाद इन्ही सब ऊहापोह में डूबे रहने के बाद मुझे नींद आ गयी। दूसरे दिन मैं उठी , तो रात की घटना को मैंने दिमाग़ से झटक दिया। नहाया, नाश्ता किया, अच्छे से तैयार हुई और किले को देखने चल पड़ी। 

वो किला जिसने मुझे पाँच मिनट तक कीलित कर दिया था, अब मैं उसके सामने खड़ी थी। मुख्य द्वार पर पहुँचते ही मुझे फिर अपने आप को संज्ञा शून्य होने जैसा अनुभव हुआ। क्या था ये? मैं हतप्रभ खड़ी थी....मेरे पैर जमीन में जमे थे और आँखे उस भव्य द्वार की ऊँचाई को निहार रहीं थी। पर मैं वहाँ नहीं थीं। मैं फिर पहुँच चुकी थी उस सबसे ऊँचे स्थान पर...जहाँ से नीचे दूर दूर तक सिर्फ बालू दिखाई देती थी....छोटे छोटे घर दिखते थे...उष्ण हवा अनुभव हो रही थी....! 

"मैडम..मैडम.." गेट पर गार्ड मुझसे कह रहा था। 

"जी.." मैं भौंचक होकर वापस आयी। 

"लेडीज़ की चेकिंग उधर हो रही है। वहाँ जाइये।" उसने कहा।

"अच्छा..." मैंने कहा और चेकिंग करा कर मैं अंदर चल दी। 

मैं बता नहीं सकती मेरे अंदर कैसे स्पंदन हो रहे थे। मेरा शरीर एकदम हल्का हो चुका था। जैसे स्थूल शरीर कहीं छूट गया हो और मेरे पास बस सूक्ष्म शरीर बचा हो। आस पास पर्यटकों के शोर गुल के बावजूद मुझे किले की दीवारें मेरे कान में कुछ फुसफुसा रहीं थीं। किले की दीवारों की मेरे कानों में फुसफुसाहट मेरे लिए कोई नई बात नही थी। शायद ये हवा की सांय सांय होती होगी जो मुझे सुनाई देती है। पहले भी हर किले में ऐसा ही अनुभव हुआ है। मैं तेज तेज भागने लगी। जैसे कि इस किले का पूरा नक्शा मुझे याद हो...मुझे किसी से भी कोई दिशा...कोई रास्ता पूछने की आवश्यकता ही नहीं थी। मैं भागी जा रही थी...जैसे मुझे वहीं पहुँचना है...वहीं...वो जगह जो मुझे बहुत अच्छी तरह याद है। 

किले के सबसे ऊँचे स्थान पर.....जहाँ उष्ण हवा बह रही थी... जहाँ गर्मी थी...सामने सूरज ढल रहा था। 

मैं हाँफने लगी...पेट में दर्द होने लगा था...मैं पेट पकड़ कर नीचे झुककर तेज तेज साँस ले रही थी। न मालूम क्यों मुझे बहुत रोना आ रहा था....मैं चिल्लाने लगी..."आ..ss.... आss...."

मैं रोती जा रही थी...सामने नीचे बालू के रेगिस्तान को देखकर चिल्लाती जा रही थी। तभी मेरे कान में एक पुरुष स्वर गूँजा.... आ गयीं तुम सोना....

मैं पागल की तरह इधर उधर देखने लगी। कोई नही था आस पास। थोड़ी दूर पर पर्यटक किले को देखते हुये इधर उधर घूम रहे थे। कोई फ़ोटो खींच रहा था, कोई सेल्फी ले रहा था। तो ....कोई....हँस रहा था....कोई जोर जोर गाना गा रहा था....कोई उल्टी कर रहा था....सब कुछ अजीब लग रहा था। पर इन सब बातों के बारे में पहले सुन चुकी थी इसलिए थोड़ी राहत थी कि मैं ही अकेली नहीं हूँ जिसे ये अजीब अनुभव हो रहे हैं। 

"कितने किलों की दीवारों से कहलवाया मेरी सोना को भेज दो...."

फिर कुछ गूँजा... आश्चर्य की बात है कि इस समय मैं पूरी तरह होश में थी। मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ गयी। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैंने बोतल से पानी पिया, अपना मुँह धोया। वहाँ से एक दृष्टि चारों ओर ऐसे डाली जैसे ये मेरी ही विरासत हो, फिर वहाँ से उल्टे पैर भाग गई।  कुछ भी मेरे बस में नहीं था। 

होटल पहुँच कर मैंने थोड़ा विश्राम किया। मैं सारे अनुभवों के बारे में एक सिरे से फिर से सोचने लगी। याद आया कि नेट पर सबने इसी तरह के अनुभव लिखे थे इस किले के बारे में मगर किसी ने भी ये नही लिखा था कि कोई आवाज़ भी उनको सुनाई दी थी। तो क्या मैं अकेली थी जिससे किला सच में बात करना चाह रहा था ? मुझे बहुत उत्कंठा हुई फिर से ये सब टटोलने की। होटल में आराम करके मैं थोड़ा बाज़ार घूमने निकली। दुकानों में पारंपरिक राजस्थानी लहँगे, आभूषण बिक रहे थे। मैंने अपने लिये पूरे श्रृंगार की चीज़ें ली, लहँगा ओढ़नी ली। 

रात में मैंने पूरी पारंपरिक राजस्थानी वेश भूषा धारण की और चल दी। अगर आप पूछेंगे कि मैंने ऐसा क्यों किया तो इसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। बस मैंने किया, क्यों ....शायद मैं भी नहीं जानती। रिसेप्शनिस्ट कुर्सी पर बैठा ऊँघ रहा था। मैंने उसे जगाना उचित नहीं समझा, बल्कि उससे बचकर बिना कोई आवाज़ किये बाहर निकल गयी। एक छोटी टोर्च से रास्ता टटोलती हुई मैं चल पड़ी किले की ओर। न मुझे डर लग रहा था...न मेरे मन में किसी अनिष्ट की आशंका थी। मैं बस ऐसे छुपते हुये जा रही थी जैसे कोई प्रेयसी अपने प्रेमी से मिलने जा रही हो। 

मुझे पता था कहाँ जाना है....वहीं किले के सबसे ऊपर स्थान पर। मैं लगभग दौड़ती हुई वहाँ पहुँच गयी। ऊपर पहुँच कर मेरे पैर एकदम ठिठक गये। एक तेज हवा का झोंका आया और जैसे मेरा कोई दूसरा ही जन्म हो गया हो। 

आश्चर्य कि वहाँ अंधेरा नहीं था। वहाँ तो बहुत रौनक थी, चहल पहल थी। जैसे कि कोई उत्सव चल रहा हो। बहुत ढेर सारे लोग थे। एक सिंहासन पर एक रौबदार पुरुष शाही वस्त्र धारण किये बैठा था, सामने आग जल रही थी, एक सुंदर शरीर वाली स्त्री अपना मुँह ढके नृत्य कर रही थी। संगीत के उपकरणों से लहर निकल रही थी। सब बहुत खुश नज़र आ रहे थे। मुझे देखते ही वो पुरूष अपने स्थान से उठा और उसने मुझे बड़े ही आत्मीय स्वर में पुकारा...….सोना....!

उसके पुकारते ही सब अदृश्य हो गया। रात की गहराई बची, चाँद की हल्की रोशनी में किले के बुर्ज पर एक किनारे वो खड़ा था और इस किनारे मैं।

मैं जैसे नशे की हालत में धीरे धीरे कदम रखती पायल से छम छम ध्वनि निकालती उस तक पहुंचने लगी। 

फिर जब अंत में थोड़ी दूरी बची, मैं दौड़ते हुये उसके पास गयी और उसके सीने पर मैंने अपना सिर टिका दिया। इतनी दिव्यता मैंने जीवन में कभी अनुभव नही की थी। मैं कहाँ थी...किस काल में थी...अंतरिक्ष की किस गहराइयों में थी नही पता। सब कुछ ऐसे था जैसे मैं गहरी नींद में कोई सपना देख रही हूँ। 

"सोना....आज हमारा मिलन पूरा हुआ। कबसे मैं इसी पल की राह देख रहा था। उस दिन तुम भागी तो ऐसी भागी कि दुबारा आयी ही नही।" 

"देवव्रत........मैं भागी नही थी मैं तुम्हारे लिए सहायता माँगने गयी थी....हमें अभी भी ये लोग जीने नहीं देंगे। ये हमारे बीच बरसों की दूरी काल बनकर खड़ी है....हमें फिर से अलग कर देगी। चलो यहाँ से अभी भाग चलते हैं।" मैं तड़प कर बोल रही थी। पता नही मैं क्या बड़बड़ा रही थी। 

"नहीं सोना...अभी कैसे जायेंगे.. अभी तो रात है। कल सुबह होते ही चल देंगे। भोर हमारे लिये सारे दुःखों का अंत लेकर आएगी।"

" देवव्रत..तुम फिर वही गलती कर रहे हो। तब भी तुमने यही कहा था। क्या हुआ था ? इसी जगह मेरे भाइयों ने तुम्हें तब भी मार कर यहीं से नीचे चील कौवे को खाने के लिये फेंक दिया था.....आज भी तुम मुझसे अलग हो जाओगे। चलो अभी यहाँ से मेरे साथ भाग चलो।" मैं उन्मत सी होकर देवव्रत का हाथ पकड़े किले की दीवार के अंतिम छोर भागती हुई आ गयी थी। 

"सोना...अब कुछ नहीं होगा। अब हमारा मिलन हो गया है। मेरी साध पूरी हुई।" देवव्रत मुझे मुस्कुरा कर अपनी प्रेम निमग्न आंखों की मदिरा पिला रहा था। उसका विराट व्यक्तित्व मुझे चुम्बक की तरह उसकी खींच रहा था, मैं नहीं चाहती थी अगर ये सपना है तो ये सपना ख़त्म हो। 

" नहीं देवव्रत...चलो अभी , अब मैं तुमसे अलग नहीं रह सकती। " मैं उन्मादिनी हो चुकी थी। मेरा हृदय बागी हो चला था, मेरी विवेक शक्ति मेरे नियंत्रण में नहीं थी।  मैंने देवव्रत का हाथ पकड़ा और किले की दीवार से छलांग लगा दी।

...............

.....…........


एक तेज आवाज़....एक चीख.....एक विस्फोट....फिर एक शून्य.......!

मेरी चेतना लौटी तो किले की दीवार के जिस स्थान से मैंने छलाँग लगा दी थी, उसी के नीचे जमीन पर मैं पड़ी हुई थी। ऐसा लगा जैसे गिरते समय किसी ने मुझे अपनी मजबूत बाजुओं में थाम कर वहाँ लेटा दिया था। 

"देवव्रत...." मैं फफक कर रो पड़ी।  सुबह होने में बस कुछ घड़ियाँ ही शेष थी। हल्का हल्का अंधकार था , हल्की हल्की ठंड वातावरण में थी। मैं उदास मन लिए वहाँ से चली आयी। 

उस दिन के बाद से प्रेमगढ़ के किले से चीखने चिल्लाने की आवाज़ आनी बन्द हो गयी थीं और किसी भी किले की दीवारों ने मेरे कान में फुसफुसाना बन्द कर दिया था। 

टि्वंकल तोमर सिंह,लखनऊ। 



Monday, 11 May 2020

झूठ कैसे बोलूँ



हाँ 
तुमसे 
नज़र फेर कर 
झूठ बोलने की
कोशिश कुछ ऐसी की
जैसे छुपानी चाही हो
अपनी माँ से 
उम्र 

टि्वंकल तोमर सिंह

Thursday, 7 May 2020

तुम कितनी मादक हो, प्रिये !

"रेणुका तुम कितनी मादक हो...तुमको 'किस' करता हूँ तो लगता है मय के घूँट पी लिये हो।" वरुण अपनी नई नवेली पत्नी के प्रेम में डूबकर कहता।

इधर रेणुका दूसरी तरफ मुँह फेरकर हल्की डकार लेती और मन में कहती..." क्यों नही लगेगा आखिर...मैंने जो..." 

रेणुका हैदराबाद की रहने वाली एक सीधी साधी लड़की थी। उसकी शादी हो गयी शिमला में रहने वाले एक परिवार के लड़के वरुण के साथ। शादी गर्मियों में हुई थी तो कुछ दिन हँसते खेलते निकल गए। लेकिन जैसे ही अक्टूबर शुरू हुआ, वहाँ सर्दी पड़नी शुरू हो गयी। हल्की हल्की ठंड, या हैदराबाद के मुकाबले थोड़ी ज़्यादा ठंड थी बस। मगर समय बीतने के साथ ठंड ने प्रचंड रूप ले लिया। 

अब तो रेणुका की हालत ख़राब चार चार स्वेटर पहने, दो दो रजाई ओढे पर ठंड थी कि हड्डियों में घुसी जाती थी। रेणुका की नाक लाल, गाल लाल देख कर वरुण बहुत चिढ़ाता था। 
"एकदम जोकर लग रही हो......लाल बन्दरिया लग रही हो।" 

रेणुका दाँत किटकिटाने के सिवाय कुछ ज़वाब नहीं दे पाती। करती भी क्या बेचारी। सर्दी ने उसके मुँह में सारे शब्द जमा दिए थे। 

उसके लिये लकड़ी जलाकर आग तापने का इंतजाम किया गया। उसे काढ़ा बना कर दिया गया। रात में गर्म पानी की बोतल साथ लेकर सोती थी। कमरे में हीटर का इंतजाम भी कर दिया गया। पर लाइट जाते ही वो बेकार हो जाता था। फिर हर वक़्त हीटर भी नहीं चलाया जा सकता था। न ही रेणुका हर वक़्त कमरे में आग तापती हुई बैठी रह सकती थी। रसोई के कामों में सास का हाथ तो बँटाना ही था। 

रेणुका से सर्दी झेली नहीं जा रही थी। कहाँ हैदराबाद में पूरे सीजन बस एक कम्बल से ही काम चल जाता था। और कहाँ यहां दस रजाई ओढ़ने से भी गर्मी नहीं मिलती। 

एक दिन वरुण के एक दोस्त ने सुझाया " भाभी जी, डॉ ब्रांडी के दो चार घूँट मार लिया करिये सब ठीक हो जायेगा।" 

वरुण और रेणुका एक दूसरे का मुँह देखने लगे। पहाड़ी परिवार की बहू और मदिरापान....न न ....नरक में कढ़ाही में डाल कर खौला दिया जाएगा उसको। 

पर जब तक खून जवान होता है, ज्यादा आगे पीछे नहीं सोचता। एक दिन चुपचाप जाकर रेणुका डॉ ब्रांडी खरीद लायी। पहली रात जब उसने एक चम्मच पी। तो उसे उल्टी हो गई। सास बाथरूम में उसकी उल्टियों की आवाज़ सुनकर बहुत खुश हो गईं। ...." आहा मेरे वरुण ने तो बहुत जल्दी खुशखबरी सुनाने का इंतजाम कर दिया।" 

इधर एक दो दिन प्रैक्टिस करने के बाद रेणुका ने ब्रांडी पीने की आदत डाल ली। उसको वास्तव में काफ़ी आराम मिला। झुरझुरी , कंपकपी लगना बन्द हो गया था। 

एक दिन जब रेणुका चुपके से डॉ ब्रांडी का सिप ले रही थी, तभी उसकी जेठानी कमरे में आ गयीं और उसे मदिरा के घूँट भरते हुये देख लिया। बस तभी उनके मुँह से एक चीख निकली और बेहोश होकर गिर पड़ी। जेठानी सिर पर पल्लू रखने वाली, शुद्ध , संस्कारी बहू थी घर की। शायद ऐसी अनैतिकता सहन न कर पाई होगीं। 

रेणुका के तो हाथ पांव फूल गये। झटपट उसने बोतल छुपाई फिर वरुण को आवाज़ दी। परिवार के और लोग भी चीख सुनकर आ गए। सबने जेठानी को होश में लाने की पूरी कोशिश की। उनके मुँह पर पानी के छींटे मारे गए। थोड़ी देर बार उनको होश आ गया। अब रेणुका का दिल धुकधुक करने लगा। अब पड़ी डाँट और अब खुली पोल। पर घोर आश्चर्य सास ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा। सबको यही बताया कि उनको कमजोरी के कारण चक्कर आ गया था।


एक दिन अकेले पा कर रेणुका से उसकी जेठानी ने पूछा, " क्यों रेणुका तेरी शीशी ख़त्म हो गयी या चल रही है?" 

रेणुका की पलक झपक न पाई। 

" क्या हुआ?" जेठानी मुस्कुराते हुये रोटियां बेलती जा रहीं थीं। 

" भाभी..वो गलती से...आ आ..."

"अरे रहने दे। मुझे न पढ़ा। औरत और मदिरापान.... नरक में पकौड़े तले जायेगे तुम्हारे।" जेठानी ने कहा। 

रेणुका सन्न रह गयी। यही बात तो उसने भी मन में सोची थी। क्या जेठानी मन भी पढ़ लेती हैं ? रेणुका चुपचाप नज़र नीचे किये खड़ी रही। क्या बोलती वो बेचारी। 

"अरे बता न...शीशी ख़त्म हो गयी हो तो बताना, मैं मंगा दूँगी।" जेठानी ने कहा। 

रेणुका आश्चर्य के समुंदर में ऐसा गोता लगाने निकली कि बहुत देर तक वापस न आ सकी। 

"नहीं चाहिये तो कोई बात नहीं। मैं अपनी शीशी मँगाने जा रही थी तो सोचा तुमसे भी पूछ लूँ। " 

"जी......????" रेणुका की आँखें खुली की खुली रह गयी।

" हाँ और क्या....ये आदमी लोग तो थोड़ा बहुत पी लेते हैं।पर हम लोग क्या करें? इतनी ठंड में जिंदा रहना है कि नहीं। तू अगर हैदराबाद से है तो मैं भी गुजरात से आई हूँ। मुझे भी इसी ब्रांडी पर गुजारा करना पड़ता है। अब तो फिर भी आदी हो गयी हूँ ठंड की। मैं उस दिन तुमको देखकर नहीं गिरी थी। मुझे वास्तव में चक्कर आ गया था। मुझे लगा तू तो आज के जमाने की लड़की है। तुम्हें क्या बताना इस बारे में। " 

रेणुका के दिल से सारा भय जाता रहा। उस दिन से जेठानी- देवरानी में एक प्यारा सा रिश्ता कायम हो गया। 

टि्वंकल तोमर सिंह,
लखनऊ। 




Friday, 1 May 2020

श्रम स्वेद


तृषा जब जब 
विकल करती है
ईश्वर के भी कंठ को

शुष्क मृदा अणु बन 
बिछ जाता है श्रमिकों के
सख्त सांवले पंजों तले

श्रम स्वेद से अधिक पवित्र,
सुस्वादु....तृप्तिदायक
कोई ओस नहीं होती !

टि्वंकल तोमर सिंह,लखनऊ।

चित्र : साभार गूगल 


रेत के घर

दीवाली पर कुछ घरों में दिखते हैं छोटे छोटे प्यारे प्यारे मिट्टी के घर  माँ से पूछते हम क्यों नहीं बनाते ऐसे घर? माँ कहतीं हमें विरासत में नह...