Saturday, 7 May 2022

धूप छाहीं ज़िन्दगी में रंग






हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का.....श्वेत- श्याम फ़िल्म में लाल दुप्पटा! क्या विरोधाभास है ! ज़रा सोचिए उस दौर में कैसे यक़ीन दिलाया गया होगा कि नायिका जिस दुपट्टे को लहरा रही है वो लाल ही है। दर्शकों की कल्पना से रंग लिये होंगे। दर्शकों के साथ एक छल किया गया। गीत के बोलों से उन्हें यकीन दिलाया गया, दुपट्टा लाल है, दर्शक मान बैठे दुप्पटा लाल है। क्या पता वास्तव में वो किस रंग का था...काला था या नीला था। 

काले और सफेद रंगों में सीमित पर्दे पर नायिका जब राजकपूर से कहती है, " राज...तुम्हारी नीली आँखें..." 
नीली? श्वेत और श्याम पर्दे पर नीला रंग कैसे दिखता भला? ये तो दर्शकों ने तब जाना जब फ़िल्मी कैनवास पर रंग बिखरने शुरू हुए। तो फिर श्वेत और श्याम पर्दे पर कैसे उस समय उन पर मरने वाली लड़कियाँ अपनी कल्पना में राजकपूर की नीली आँखों से आँखें चार करती होंगी? 

श्वेत-श्याम टीवी के पर्दे पर हमारी पीढ़ी के बच्चों ने बहुत बार रंग ढूंढने कोशिश की। और मजे की बात ये है कि हमें दिख भी जाते थे। कहीं किसी कोने में मटमैला लाल या भूरा, कभी चमकदार नीला, कभी सतरंगा। हम उतने से ही ख़ुश हो जाते थे। वास्तव में टेक्नोलॉजी के आदिम युग में सस्ते टीवी के सस्ते काँच पर प्रकाश जब अपवर्तन-परावर्तन का खेल खेलता था तो यूँ ही भ्रम पैदा कर देता था। कुछ दिनों बाद ब्लैक एंड व्हाइट टीवी को रंगीन बनाने की कोशिश यूँ की गई कि रंगीन काँच पर्दे के आगे लगा दिए गए...कभी लाल..कभी पीले..कभी हरे... कभी नीले...या कभी कभी एक ही साथ चारों रंग के। अब जो भी बोलता-चित्र चलता थोड़ा तो रंगबिरंगा लगता। इतने से ही रंगों से हम ख़ुश थे, तृप्त थे। हमें अधिक की तो चाह ही नहीं थी। 

देखा जाए तो इन बातों में गहरा दर्शन छुपा है। हर किसी को आसानी से जीवन में रंगीनी प्राप्त नहीं होती। विरले होंगे जिन्हें जीवन में विधाता ने सारे सुख दिए हैं या सारे रंग दिए हैं। अधिकतर लोगों को असुविधा में, अतृप्ति में, अभाव में ही जीवन काटना पड़ता है। यह स्वीकार कर लेना होता है अपनी तो ज़िन्दगी यूँ ही है श्वेत और श्याम। तो क्या जीवन का आनंद मनाना छोड़ देंगे? जीवनोत्सव को अगले जन्म तक स्थगित कर देंगे? क्यों नहीं अपनी कल्पना से रंग ले लेते हैं कुछ इस तरह जैसे पुराने समय में काली-सफेद फोटोग्राफ को ऊपर से रंगकर थोड़ा सा रंग-बिरंगा कर लिया जाता था ? 

अरुणिमा सिन्हा एक आम यात्री की तरह ट्रेन के डिब्बे में बैठी थीं। तभी कुछ बदमाश लोग आए और उनसे उनका कीमती सामान छीनने की कोशिश करने लगे। विरोध करने पर उन लोगों ने उन्हें डिब्बे से बाहर पटरी पर फेंक दिया। दूसरी ओर से आती तेज गति की गाड़ी उनके पैरों के ऊपर से गुज़र गयी। कुछ ही पलों में उनकी ज़िंदगी से दुर्भाग्य ने सारे रंग छीन लिये। पर ये उनकी ही ज़िद थी। उन्होंने जीवन को श्वेत-श्याम नहीं रहने दिया। आर्टिफिशियल पैरों के सहारे उन्होंने हिमालय की चढ़ाई की और एवरेस्ट पर चढ़कर सूर्योदय देखा। उस सूर्योदय से उन्होंने सारे रंग अपने जीवन में वापस ले लिये। 

कुछ लोगों को उदास रहने की बीमारी होती है। वो जीवन में सुख नहीं दुःख गिन-गिन कर बताते रहते हैं। सुख उनके लिये बस यूँ ही है जैसे रोज़ सूरज का निकलना। यह सारी रंगबिरंगी दुनिया उनके लिये काली-सफेद है। उन्होंने आसानी से मिलने वाली हर चीज़ को सस्ती व महत्वहीन मान लिया है। उन्हें वो सब कुछ मिला है जिसके लिये दूसरे लोग संघर्ष कर रहे हैं, फिर भी वो दुखी हैं। उन्हें आभारी होना नहीं आता। हमें प्रतिदिन आसानी से प्राप्त हो जाने वाली चीजों के लिये ईश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए। जैसे पीने का स्वच्छ पानी घर बैठे मिल रहा है, नेमत नहीं है तो क्या है? ज़रा उनसे पूछिये जो दस मील दूर से पीने का पानी सिर पर ढो कर लाते हैं। 

खलील जिब्रान कहते हैं," मुझे अपने प्राणों को रंगने दे; मुझे सूर्यास्त निगलने दो और इंद्रधनुष पीने दो।" कितना सुंदर दर्शन है। प्रकृति की हर चीज़ में रंग है, सुंदरता है, जीवन रस है। दुनिया को रंगों से भर देने वाला सूर्यास्त सामने हो और हम अपनी उदास आत्मा लिये बैठे रहें, तो हमसे बड़ा मूर्ख कौन है? सात चमकदार रंग लिए मन पर उमंगों का तीर छोड़ने को तैयार 'इंद्रधनुष' आकाश पर सजा हो और हमारे मन में एक भी रंग न जगे, तो हमारे भीतर ही कोई कमी है। 

उदासी बड़ी ख़तरनाक बीमारी होती है। यह पूरा ब्रह्माण्ड खा जाती है फिर भी आत्मा को बोझिलता के दलदल में डुबोये रखती है। इससे बचने का मात्र एक ही उपाय है, अपने रंग स्वयँ तलाशिये। यह जीवन एक कोरे कैनवास की तरह हैं। इसमें रंग-बिरंगे चित्र हमें ही भरने हैं। बच्चों सा सरल हृदय रखना होगा, जो अतीत में रहकर दुखी नहीं होते, भविष्य का सोच कर चिंतित नहीं होते। बस वर्तमान से अपने दिन को उज्ज्वल बनाते रहते हैं। मन में उमंग हो तो लुप्तलोचन सूरदास जी को भी नटखट कान्हा की 'ईस्टमैन कलर छवि' के दर्शन हो जाते हैं। 

(जनसत्ता के सभी संस्करणों में संपादकीय पेज़ पर आज दिनाँक 07/05/22 को प्रकाशित लेख।) 


~टि्वंकल तोमर सिंह

Wednesday, 27 April 2022

कक्षा कक्ष कभी बन्द नहीं होते

कक्षा कक्ष
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विद्यालय विद्यालय होते हैं। ये और बात है कभी कभी किसी घर को स्कूल बना दिया जाता है। घर वाले स्कूल लचीले से होते हैं। उसमें स्केल से सीधी सीधी लाइन्स खींच दी गयीं हों ऐसी प्रतीति नहीं होती। ऐसे विद्यालओं में एक्स्प्लोर करने की संभावना अधिक होती है। जैसे मेरे विद्यालय में कुछ एक कमरे में कुछ अजीब सी सीमेंट से अलमारी जैसी आकृति बनी होती थी। उस पर हम लोग अपने बस्ते रख दिया करते थे। आज जब उसे अपनी स्मृति में दूर के फोकस से देखती हूँ तो पाती हूँ कि वो एक फायर प्लेस था। फिर मेरे मस्तिष्क ने पूरे स्कूल की संरचना का विश्लेषण कर डाला और पाया उसमें आंगन था, बैठक था, रसोई थी,  बाहर पोर्च था (शायद कार खड़ी होती होगी।), पोर्च के सामने छोटी सी गोल आकार की वाटिका। लाल रंग की एक बँगलानुमा इमारत। शायद किसी अंग्रेज ऑफिसर का बंगला रहा होगा या किसी संभ्रांत बंगाली का।

किसी घर को स्कूल न बनाया गया हो तो उनके बड़े नीरस आकार होते हैं। बीएड के दौरान विद्यालय के आकार के बारे में पढ़ाया गया था। एल आकार का, सी आकार का, ई आकार का। 

विद्यालय की इमारतों में दरवाजे अंदर की ओर बन्द नहीं होते। कक्षा के दरवाजों में अंदर से नहीं, बाहर की ओर सिटकनी/कुंडी/कड़ी होती है। शायद इसलिए कि कक्षा में अंदर से बंद करके बैठने की क्या आवश्यकता? बच्चों को तो यही लगता होगा कि विद्यालय के कक्ष सदैव खुले रहते हैं। पर खिड़कियों में सिटकिनियाँ होतीं हैं, क्योंकि अक्सर सर्दियों के मौसम में खिड़कियां बन्द करके बैठा जाता है। 

संभवतः दरवाजे में कमरे की अंदर की ओर कुंडी या सिटकनी न लगाने के पीछे खर्च कम करना ही उद्देश्य रहता होगा। 

इस पर सोचा जाए तो ये दार्शनिक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कक्षा-कक्ष वह कक्ष नहीं होता जहाँ एक निराश और हताश मन संसार से मुँह मोड़ कर कमरा बन्द करके बैठ जाये। ये मन का विकास करता है। 

विद्यालय वो स्थान हैं जहाँ विद्यार्थियों के मस्तिष्क को खुली सोच मिलती है, शिक्षा का प्रकाश मिलता है। यदि बच्चों को लगता है कि विद्यालय के कक्ष कभी बन्द नहीं होते.....

....तो उन्हें सही ही लगता है...!!

~ टि्वंकल तोमर सिंह

Thursday, 21 April 2022

लिंग भेदभाव

लिंग भेदभाव
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बचपन में भाई बहनों में लड़ाई होना आम बात है। हम भी अलग न थे। भाई से लड़ाई शुरू होती थी शास्त्रार्थ से और फिर हमारे अंदर बैठे नारायण याद दिला देते थे," सारे रिश्ते मोह माया है।" तो बस, शास्त्रार्थ महाभारत में बदल जाता। उस समय हमारे दो कमरे के राजमहल में तीर-धनुष, भाला-कटार तो होते न थे, तो हाथों और पैरों से युद्ध लड़ना पड़ता था। मुक्केबाजी, कराटेबाज़ी, कुश्ती, ओखल कूटना जैसे सारे टैलेंट नैसर्गिक रूप से हमें मिले थे। पर यहाँ मेरे अंदर लिंग भेदभाव की भावना बलवती थी। भाई के साथ नोचा-नोची, मुक्कालात सब होता पर बहनों के साथ केवल मौखिक संग्राम पर ही बात ख़त्म हो जाती थी। 

डिग्री ख़त्म करके मैंने करियर शुरू किया। सौ से ऊपर बच्चों की कक्षा को अनुशासन में रखना कठिन है। फिर उस पर अगर वो लड़के हों, तो बहुत मुश्किल हो जाता है। न चाहते हुये भी कभी कभी छड़ी उठानी पड़ ही जाती है। कभी कभी तो ये छड़ी ही राम जी की पादुका की तरह मेज पर रखे-रखे शासन कर लेती है, कक्षा-राज्य में शांति कायम रहती है। लड़के अक्सर कहते हैं ," मैम, आप बहुत भेदभाव करती हैं। लड़कियों को हाथ भी नहीं लगातीं और हम लड़कों को छड़ी, डस्टर, स्केल जो भी मिल जाये उससे कूट डालती हैं।" अब मैं क्या बताऊँ कि लड़कियों के पास एक ब्रह्मास्त्र होता है, जिसके आगे हमारी छड़ी जैसे तुच्छ अस्त्र की क्या बिसात? ज़रा सा डाँट भर दो उनकी आँखों में नलका बहने लगता है और हम कठोर से कठोर हृदय वाले अध्यापकों का सारा क्रोध उसी में बह जाता है। 

फ़ेसबुक पर कई लोगों ने मैसेंजर में आकर इल्ज़ाम लगाया। "मैम, आप बहुत भेदभाव करती हैं। मानव के कमेंट को नीला अँगूठा और मानवी के कमेंट को हृदयरूपी रक्तवर्णी प्रतिक्रिया चिन्ह।" अब मैं क्या बताऊँ....एक मानवी मुझ अकिंचन से बिना खार खाये, बिना जले-भुने, मेरे ट्रिक से खींचे गए, फिल्टर से नहलाये गए, डिजिटल चित्र को न केवल पसंद कर रहीं हैं, उस पर प्यारे प्यारे प्रेम-पगे शब्दों से पुष्प-वर्षा कर रही हैं, उस पर काव्य सृजन की इच्छा प्रकट कर रही है, तो बदले में मैं उन्हें कृतज्ञतापूर्वक 'दिल' भी न दूँ? फिर उन्हें ये अनुभव कराना होता है कि वे मेरे हृदय में 'ख़ास' स्थान रखतीं हैं। मानव का क्या है उन्हें तो खिचड़ी भी इसीलिए पसंद आ जाती है क्योंकि हिन्दी व्याकरण के हिसाब से वह स्त्रीलिंग है। सच बात तो यह है कि मानव को तो दिल वाला रिएक्शन इसलिए नहीं देती कि कहीं उन्हें ये न लगे 'रिएक्शन' नहीं...सीधे 'दिल' ही दे दिया है। आख़िर इस मामले में वे बहुत नाज़ुकमिज़ाज़ होते हैं। उन्हें खाँसी-ज़ुकाम-कोरोना की ही तरह 'इश्क़' बहुत जल्दी पकड़ लेता है।

उफ़्फ़.....पर सच में शर्मिंदा हूँ.....पता नहीं ये लिंगभेदभाव की भावना मेरे हृदय से कब निकलेगी? 

~ टि्वंकल तोमर सिंह

Sunday, 3 April 2022

जीवशाला

रात कभी भी 
रंग नहीं छीन लेती...
स्याह दृश्यों को चाहिए 
थोड़ा सा उजाला...
और थोड़ा सा दृष्टिकोण! 
जीवन जीवशाला है
अँधेरी कोठरी...कभी नहीं..कभी नहीं... 

~ टि्वंकल तोमर सिंह 

Friday, 1 April 2022

ऑल फूल्स डे

ऑल फूल्स डे
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हम सब जीवन में कभी न कभी इस दिवस पर मूर्ख बने हैं या किसी दूसरे को मूर्ख बनाने का प्रयास किया है। एक बार इस दिवस पर मूर्ख बनने वाला व्यक्ति सारे जीवन इस 'अप्रैल फूल' बन जाने की घटना को याद रखता है। कुछ अधिक ही सतर्क रहता है।

दो मजेदार उदाहरण याद आ रहे हैं।

मेरे घर में सेम की बेल लगी थी। अच्छा खाद-पानी पाकर उसमें सेम की फलियाँ लहलहाने लगीं। इतनी कि मेरे छह लोगों के परिवार के लिये उसे निपटा पाना संभव न था। अतः उसे मोहल्ले में बाँटने का निर्णय लिया गया। इस लकी ड्रा के लिये सबसे पहले उस परिवार को चुना गया जिससे हमारी सबसे अधिक घनिष्ठता थी। पिता जी ने एक थाली में सेम रखकर, ऊपर रुमाल से ढककर मुझे थमा दी और कहा-अमुक ऑन्टी को दे आओ। जब मैं उनके घर थाली लेकर पहुँची तो ऑन्टी ने थाली लेने से मना कर दिया। कारण उस दिन एक अप्रैल था। उन्हें लगा मैं उन्हें मूर्ख बनाने के लिये थाली में कंकड़-पत्थर रख कर लायी हूँ। बाद में उन्हें रुमाल हटाकर दिखाया तब वो मानी, फिर भी सशंकित थीं कि कहीं सेम के अंदर कुछ भरा न हो। 

मेरे एक भैया थे। एक अप्रैल को उनका जन्मदिन था। पहले जन्मदिन मनाया नहीं जाता था। पर एक बार उनके घरवालों ने उनका जन्मदिन मनाने का निर्णय लिया। वो सुबह सुबह आस पड़ोस में अपने सभी संगी साथियों को निमंत्रण दे आये। संध्या के समय पार्टी की समस्त तैयारी करके नन्हें अतिथियों की प्रतीक्षा करने लगे। पर एक भी बालक घर नहीं आया। कारण आप समझ ही सकते हैं।

एक अप्रैल को थोड़ा बहुत मौज-मस्ती तो बचपन में होती ही थी। कभी साबुन के टुकड़े को टॉफी की पन्नी में लपेट कर किसी बच्चे को खिला दिया, चाय में नमक मिला दिया, टूटी कुर्सी पर बैठा दिया...आदि..आदि..

पर कुछ लोगों की प्रवृत्ति होती है दूसरों को मूर्ख बना कर अपना मतलब निकाल लेना। पेशेवर ठगों की बात जाने दीजिए, सामान्य जीवन में भी कुछ अति चालाक क़िस्म के लोग मिल जाएंगे, जिनके झाँसे में सीधे-साधे व्यक्ति यदि फंस जाए तो उनका मूर्ख बनना निश्चित है।

किसी भोले भाले,अनपढ़ फेरी वाला जो अधिक हिसाब नहीं जोड़ पाता उससे चीज़ हड़प लेना और पैसे भी कम दे देना, घर में कामवाली से आवश्यकता से अधिक काम लेना (कि जितने पैसे उसे दिए हैं उससे अधिक ही वसूल लें) किसी मासूम मित्र के बात बात पर धन खर्च करवा देना, दूसरे के घर में कोई चीज़ है तो उस चीज़ का माँग माँग कर प्रयोग करते रहना, पर स्वयँ उसको न खरीदना, दूसरे से मीठी मीठी बातें करके उससे अपना काम निकलवा लेना...पता नहीं कितने उदाहरण मिल जाएंगे दुनिया में।

चालक व्यक्ति को इसमें एक परपीड़क सुख के अलावा क्या संतोष मिलता है? क्या सुख की सच्ची परिभाषा से वो वास्तव में परिचित हैं? वह व्यक्ति जिसे आपने मूर्ख बनाया, या तो वो पहले से आप पर भरोसा करता था, तब आप उसे मूर्ख बना पाए या फिर उसने आपको अपना विश्वास जीतने का एक मौका दिया था,पर आपने खो दिया। असली मूर्ख कौन हुआ फिर?

~ टि्वंकल तोमर सिंह,लखनऊ। 

Monday, 14 February 2022

प्रेम पर क्षणिकाएँ

1
●●●
प्रेम अग्नि है

जिन्होंने कभी टूटकर
प्रेम नहीं किया
वो कभी नहीं जान पायेंगे
कितनी पवित्र है ये अग्नि 
दीये की लौ सरीखी!


2
●●●
प्रेम 
सोते हुए शिशु के 
अधर पर रखी
निर्बोध, निष्पाप स्मित है।
संसार को दिखता है मंदहास 
अनुरागी मन को प्रिय के स्वप्न! 

3
●●●
तरुणाई में 
हर इक रोम के तले
फूटतीं हैं कोपलें, 
प्रेम का बीज
हृदय की माटी में 
जब है कुलबुलाता !


4
●●●
प्रेम-बीज 
हृदय में बो कर 
प्रेमी कृषक
प्रतीक्षा करता है 
प्रीत-इंद्राणी के 
नेह-मेघ बरसाने की! 

5
●●●

दूर देश में 
बसने वाले प्रेमियों की
प्रेयसियों को
अलिंगन की कमी 
नहीं खलती..

प्रेम के वलय 
उनको उष्ण रखते हैं! 
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~ टि्वंकल तोमर सिंह

Friday, 31 December 2021

अलविदा 2021





घड़ी को हाथ में बाँध लेने से समय भी मुट्ठी में कैद हो जाता तो कैसा होता? एक कमरे में सारी खिड़कियाँ और दरवाज़े बंद हों , हवा रुंध जाए, कुछ वैसा होता। उम्रदराज़ होना क्या इतना बुरा होता है कि समय को रोक कर रख लेने की हसरत पाली जाये? शरीर बूढ़ा होता जाता है, पर क्या आत्मा हर दिन नया अनुभव, नया ज्ञान पाकर और जवान नहीं होती जाती है? 

पीछे मुड़कर देखने पर हम पाते हैं कि बीते वर्षों में हम कितने ख़ुश थे। हमारे पास उम्मीदों का सागर था। हम कम उम्र थे, कम फिक्रमंद थे। पर क्या आत्मा का ये निखार था? दुःखों को सहने की शक्ति थी? अपने अंदर मजबूती थी? कोई भी संकट आये हम डटकर मुकाबला कर लेंगे ये विश्वास था? 


कहते हैं यदि आप अपने आज के आनंद को टेस्ट करना चाहते हैं तो ज़रा सोचिये कि आप दस वर्ष पूर्व किस अवस्था में थे। यदि आपको मौका मिले तो क्या आप उसी अवस्था में जाना चाहेंगे? आप अपनी दस वर्ष पूर्व की फ़ोटो तक पसंद नहीं करते हैं, उसी में लाख कमियाँ दिखती हैं। तो सोचिए जीवन में कितनी कमी दिखेगी? 

दो हज़ार इक्कीस का हासिल बस इतना रहा कि उसने हमसे बहुत कुछ छीन तो लिया, पर हमें कहीं न कहीं बहुत बहुत मज़बूत बना गया। हमें ये अनुभव करा गया कि हम सब एक चलती ट्रेन के मुसाफ़िर हैं, कब किसका स्टेशन आ जाये नहीं पता! 

दुःखों से शरीर भले ही पीला हो रहा हो...पर आत्मा हरी होती जाती है!

जाते हुये इस साल को ज़फ़र इक़बाल जी के इस शेर के साथ अलविदा कहना चाहती हूँ- 

सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा 
मैं बूढ़ा होता जाता हूँ जवाँ होने की ख़ातिर 


~ टि्वंकल तोमर सिंह,लखनऊ। 


रेत के घर

दीवाली पर कुछ घरों में दिखते हैं छोटे छोटे प्यारे प्यारे मिट्टी के घर  माँ से पूछते हम क्यों नहीं बनाते ऐसे घर? माँ कहतीं हमें विरासत में नह...